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पुण्यतिथि : 18 सितंबर पर विशेष राष्ट्रीयता के अग्रदूत थे साहित्यकार-संपादक बाबू बालमुकुंद गुप्त

September 17, 2021 06:22 PM

पंचकूला। - सत्यनारायण गुप्ता- हरियाणा प्रदेश के रेवाड़ी जिले के नाहड़ विकास खण्ड के अन्तर्गत एक गांव है गुड़ियानी, जिसके बारे मेें एक प्राचीन कहावत प्रसिद्ध है -

चहार चीज तोहफा - ए-गुड़ियानी।

बेर, सौदागर, घोड़े, कोठी का पानी।।

यानि यह प्राचीन ऐतिहासिक गांव पठानों के समय से अपने घोड़ों के सौदागरों, बेरों तथा कोठी नामक कुएं के पानी के लिए विख्यात है। कहते हैं कि दूसरे विश्वयुद्ध में अंग्रेजी सेना को करीब पचास फीसदी घोड़े इसी गुड़ियानी क्षेत्र से प्राप्त हुए थे, किन्तु कुछ साल पहले गुड़ियानी के जिस लाल से खुद गुड़ियानी के लोग अनभिज्ञ से थे, आज पूरा प्रदेश गुड़ियानी में जन्मे उस सुविख्यात कलमकार की जन्मस्थली होने का गर्व अनुभव करते हुए उनके भूले-बिसरे व्यक्तित्व एवं कृतित्व को चिरस्थायी एवं प्रेरणापुंज बनाने के लिए सरकारी, सामाजिक एवं साहित्यिक तौर पर कुछ रचनात्मक प्रयास करने मेें जुटा है। अब हरियाणा प्रदेश के गांव गुड़ियानी का नाम आते ही मानस पटल पर एक तस्वीर उभरती है आजादी के दीवाने एक कलमकार की, जिन्होंने गुलामी के दिनों में गोरी सरकार के दमनचक्र को तोड़ने तथा आजादी प्राप्ति के लिए कलम के माध्यम से जनमुहिम चलाने में सर्वस्व न्यौछावर कर दिया। यशस्वी साहित्यकार एवं मूर्धन्य पत्रकार स्व. बाबू बालमुकुन्द गुप्त जी राष्ट्रीयता के अग्रदूत तथा हिन्दी पत्रकारिता के पितामह के रूप में जाने जाते हैं। कलम के माध्यम से स्वतन्त्रता की अलख जगाने वाले कुशल सम्पादक गुप्त जी हिन्दी के उन्नायक के रूप में सुविख्यात हैं। गत कुछ सालों में प्रदेश के इस भूले-बिसरे साहित्यकार के व्यक्तित्व एवं कृतित्व को प्रेरक एवं चिरस्थायी बनाने के प्रयासों को काफी सफलता भी मिली है,फिर भी अभी तक विख्यात स्वतन्त्रता-सेनानी, कर्मठ कलमकार तथा भारतेन्दु युग के सेनापति के रूप में अलंकृत गुप्त जी कि विराट व्यक्तित्व एवं बहुआयामी कृतित्व पर अभी बहुत कुछ होना शेष बाकी है।

 

14 नवम्बर 1865 को तत्कालीन रोहतक तथा वर्तमान रेवाड़ी जिले के गुड़ियानी गांव में डीघल से आकर बसे ‘बख्शीराम वालों’ के गोयल गोत्रीय अग्रवाल खानदान में लाला पूरणमल के घर जन्मे इस कुलदीपक ने अपना सारा जीवन अध्ययन, लेखन एवं सम्पादन में लगाकर गुलामी के दौर में स्वतन्त्रता की अलख जगायी। उन दिनों सियालकोट से होडल तक फैले महापंजाब में राज्य की पांचवीं कक्षा में अव्वल दर्जा हासिल करके उन्होंने अपनी कुशाग्र बुद्धि का परिचय दिया। आठवीं कक्षा के छात्र के रूप में वे बालकवि हो गए तथा मथुरा से निकलने वाले उर्दू-पत्र ‘मथुरा’ में प्रकाशित होने लगे। झज्जर के पं. दीनदयाल शर्मा जी, जो मथुरा-पत्र के सम्पादक थे,ने शैदा उपनाम से लिखने वाले बालक बालमुकुन्द की प्रतिभा को पहचान दी तथा न्यायोचित मंच प्रदान करते हुए 1886 में ‘अखबारे-चुनार’ का सम्पादन इन्हे सौंपा, जिन्हें इन्होंने बखूबी निभाया तथा अपनी लेखकीय दक्षता के चलते वे वृंदावन, अवधपंच, कोहेनूर, विक्टोरिया गजट, भारत-प्रताप, हिन्दुस्तान, उर्दू-ए-मोअल्ला, ज़माना, हिन्दी बंगवासी में लेखन की विभिन्न विधाओं में नए प्रयोगों के माध्यम से नए आयाम स्थापित करते रहे। हिन्दुस्तान से उन्होंने हिन्दी पत्रकारिता को नयी ऊंचाइयां प्रदान की तथा आखिर में ‘भारत मित्र’ (कोलकाता) के आजीवन सम्पादक रहे जिसमें ‘शिवशम्भू के चिठ्ठे’ नामक स्तम्भ से अंग्रेजों की दमन एवं शोषण की प्रवृत्ति की बधिया उधेड़ी तथा तानाशाह अंग्रेज अफसर लार्ड कर्जन तक को झाड़ पिलाई। 16 जनवरी 1899 से आखिरी सांस तक उन्होंने ‘भारत मित्र’ को विशिष्ट पहचान दिलवायी तथा 18 सितम्बर 1907 को आजादी के अरमानों को दिल में संजोए यह देशभक्ति प्रचारक कलमकार चिरनिद्रा में खो गया।

 

मात्र 42 वर्ष के जीवन में गुप्त जी लेखन एवं जीवन में अपनी बेबाकी के चलते ओजस्वी कवि, सिद्धहस्त लेखक, कुशल सम्पादक, निडर पत्रकार, सतर्क समालोचक, हिन्दी के उन्नायक, पत्रकारिता के गौरव, चिन्तनशील निबंधकार, भावप्रधान अनुवादक, सच्चे समाज सुधारक, चुटीले व्यंग्यकार तथा सर्वोपरि नेक इन्सान सिद्ध हुए। आर्य विचारधारा के प्रबल समर्थक रहे गुप्तजी जी ने हिन्दी साहित्य एवं हिन्दी पत्रकारिता को नयी दिशा एवं ऊंचाइयां प्रदान की।

 

एक तरफ जहां विभिन्न प्रदेशों में इस यशस्वी साहित्यकार की स्मृति को प्रेरक बनाने के लिए अकादमियां स्थापित हैं वहीं उनकी जन्मस्थली से गौरवान्वित हरियाणा प्रदेश ने उनके देहान्त के आठ दशकों बाद तक भुलाए रखा। सन् 1998 से रेवाड़ी के कुछ साहित्यसेवियों ने गुड़ियानी स्थित उनकी हवेली की बदहाली तथा धूल-धुसरित हो रही उनकी पांडुलिपियों को देखा तो उन्होंने क्षेत्रीय स्तर पर कुछ रचनात्मक प्रयास किए। फिर स्वतन्त्रता सेनानी एवं वयोवृद्ध लेखक हरिराम आर्य के संयोजन में बाबू बालमुकुंद गुप्त पत्रकारिता एवं साहित्य संरक्षण परिषद् का गठन करके गुप्त जी के भूले-बिसरे व्यक्तित्व एवं कृतित्व को चिरस्थायी एवं प्रेरणापुंज बनाने की पहल की जिसे रेवाड़ी, महेन्द्रगढ़, झज्जर, गुड़गांव के अलावा प्रदेश तथा अन्य स्थानों के साहित्यसेवियों एवं प्रबुद्धजनों का रचनात्मक सहयोग एवं समर्थन मिला। गांव से राष्ट्रस्तर तक गुप्त जी के लिए जनमानस एवं सरकार को परिचित कराते हुए उन्हें न्यायोचित सम्मान प्रदान करने की पहल को उस समय बल मिला जब उनकी 93वीं पुण्यतिथि पर पधारे हरियाणा साहित्य अकादमी के निदेशक डॉ. चंद्र त्रिखा ने उनकी स्मृति में अनेक ठोस परियोजनाएं लागू करने का मंच से आश्वासन दिया तथा 94वीं पुण्यतिथि पर परिषद् द्वारा गुड़ियानी में आयोजित प्रदेश स्तरीय श्रद्धांजलि समारोह में हरियाणा साहित्य अकादमी के अध्यक्ष ने घोषणा कर गुप्त जी के नाम से पत्रकारिता एवं साहित्य क्षेत्र में दो पुरस्कार प्रारम्भ करवाए। इतना ही नहीं,अकादमी के देखरेख में गुप्तजी पर केंद्रित प्रदेश भर में साहित्य चेतना यात्राओं का आयोजन भी किया गया।

हरियाणा साहित्य अकादमी तथा बाबू बालमुकुंद गुप्त पत्रकारिता एवं साहित्य संरक्षण परिषद्, रेवाड़ी के संयुक्त तत्त्वावधान में पिछले दो दशकों से प्रतिवर्ष उनकी पुण्यतिथि पर राज्य स्तरीय बाबू बालमुकुंद गुप्त स्मृति समारोह का आयोजन गुड़ियानी, रेवाड़ी, झज्जर, गुरुग्राम तथा चंडीगढ़ में आयोजित किया जाता रहा है। इस समारोह के अंतर्गत पुस्तक मेले,कवि सम्मेलन, विचार गोष्ठी,पुस्तक चर्चा, पुस्तक लोकार्पण, साहित्यकार सम्मान आदि कार्यक्रम विभिन्न शैक्षणिक संस्थानों में आयोजित किए गए हैं। अभी तक इन कार्यक्रमों के अंतर्गत शताधिक नव प्रकाशित कृतियों का लोकार्पण व चर्चा से इसकी साहित्यिक पृष्ठभूमि का अंदाजा लगाया जा सकता है। अकादमी के अलावा परिषद् भी गत दो दशकों से प्रतिवर्ष साहित्य एवं साहित्यिक पत्रकारिता के क्षेत्र में दो रचनाकारों को सम्मानित करती रही है।

गुप्त जी की पुण्यतिथि के शताब्दी वर्ष के अवसर पर जहां वर्ष 2007 में उनकी जन्मस्थली को आदर्श गांव का दर्जा प्रदेश सरकार ने दिया वही गांव के राजकीय वरिष्ठ माध्यमिक विद्यालय का नामकरण उनके नाम से किया गया।

साल 2016 में हरियाणा ग्रंथ अकादमी के उपाध्यक्ष डा वीरेंद्र सिंह चौहान ने बाबू जी की गुडियानी स्थित हवेली में मुख्य अतिथि के रूप में पधार कर आयोजन का वर्चुअल सीधा प्रसारण करवा नई गरिमा प्रदान की । वर्तमान अध्यक्ष की प्रेरक पहल से जहां पांच वर्ष पूर्व रेवाड़ी स्थित इंदिरा गांधी विश्वविद्यालय में बाबू बालमुकुंद गुप्त पीठ की स्थापना की गई, वहीं गत वर्ष कोरोना काल के अंतर्गत अकादमी अध्यक्ष ने पंचकूला स्थित अकादमी भवन में गुप्त जी की प्रतिमा का लोकार्पण करने के बाद उपस्थित जनसमूह को संबोधित करते हुए गुड़ियानी उनकी हवेली में जाकर उनके भावपूर्ण स्मरण करने का आश्वासन परिषद् को दिया। आज प्रदेश एवं देश के विभिन्न स्तर के पाठ्यक्रमों में बाबू बालमुकुंद गुप्त जी को न्यायोचित स्थान दिया जाने लगा है, किंतु आज भी गुप्त जी की हवेली को राष्ट्रीय-स्मारक घोषित करने, उनके नाम से पत्रकारिता शोध संस्थान खोलने, प्रदेश के अन्य विश्वविद्यालयों में उनके नाम से पीठ स्थापित करने, उन पर डाक टिकट जारी करने तथा गुड़ियानी व रेवाड़ी में उनके स्मारक स्थापित करने की चिरपरिचित मांगे लम्बित हैं। परिषद् के संरक्षक अधिवक्ता नरेश चौहान का मानना है कि राष्ट्रीय स्तर पर गुप्त जी के योगदान को रेखांकित करने के लिए अभी बहुत कुछ होना बाकी है।

हरियाणा साहित्य अकादमी निरंतर गत दो दशकों से गुप्तजी की स्मृति में होने वाले कार्यक्रमों में निरन्तर शिरकत कर उनका भावपूर्ण स्मरण करती रही है। इस पुनीत पहल को राष्ट्रीय स्तर तक ले जाने लिए इसी प्रकार के कुछ ईमानदार प्रयासों की आवश्यकता ही नहीं अनिवार्यता है। देखना यह है कि राष्ट्रीय मानचित्र पर गुप्तजी तथा उनकी जन्मस्थली गुड़ियानी को अपेक्षित मान-सम्मान कब मिलता है?

 

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बाबू बालमुकुंद गुप्त स्मृति समारोह रेवाड़ी में आज

पंचकूला, 17 सितंबर

हरियाणा साहित्य अकादमी, पंचकूला तथा बाबू बालमुकुंद गुप्त पत्रकारिता एवं साहित्य संरक्षण परिषद्, रेवाड़ी के संयुक्त तत्वावधान में 18 सितंबर को हिंदी पत्रकारिता के मसीहा तथा हिंदी गद्य के जनक यशस्वी साहित्य कार्य मूर्धन्य पत्रकार स्वर्गीय बाबू बालमुकुंद गुप्त की 114 वीं पुण्यतिथि पर स्मृति समारोह का आयोजन रेवाड़ी की मॉडल टाउन स्थित लायंस भवन किया जाएगा।

उक्त जानकारी देते हुए अकादमी के प्रवक्ता ने बताया कि कोसली के विधायक लक्ष्मण सिंह यादव के मुख्य आतिथ्य में होने वाले इस समारोह की अकादमी निदेशक डॉ चंद्र त्रिखा अध्यक्षता करेंगे तथा हरियाणा ग्रंथ अकादमी के निदेशक डॉ वीरेंद्र सिंह चौहान विशिष्ट अतिथि रहेंगे। गुप्त जी के प्रपौत्र बिमल गुप्त समारोह में स्वागताध्यक्ष की भूमिका निभाएंगे। उन्होंने बताया कि आज़ादी के अमृत महोत्सव पर केंद्रित समारोह में राष्ट्रीयता के अग्रदूत, हिंदी उन्नायक, भारतेंदु युग के सेनापति बाबू बालमुकुंद गुप्त जी का विचार गोष्ठी के माध्यम से भावपूर्ण स्मरण किया जाएगा। समारोह में अठारह नवप्रकाशित कृतियों का लोकार्पण किया जाएगा तथा परिषद् की ओर से बाबू बालमुकुंद गुप्त पुरस्कार दिए जाएंगे।

 

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