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मुझे भी कुछ कहना है....! विश्लेषण..... सूबों में क्यों पिछड़ रही है भाजपा.

February 13, 2020 06:32 PM
मुझे भी कुछ कहना है....!
विश्लेषण.....
सूबों में क्यों पिछड़ रही है भाजपा.....!
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दिल्ली विधानसभा चुनाव के नतीजों के आने बाद सोशल मीडिया से जुड़े मित्रों से एक सवाल किया था, केंद्र में लगातार दूसरी बार भारी बहुमत हासिल करने वाली भाजपा सूबों के चुनाव में क्यों पिछड़ रही है ? काफ़ी मित्रों ने बेहद सटीक, तथ्यात्मक जबाब दिए.....
उनके आधार पर मैं आपकी भी बात का विश्लेषण करने का लघु प्रयास कर रहा हूं...
.....कुछ माह पूर्व ही संम्पन हुए लोकसभा चुनाव में बिखरा हुआ विपक्ष पीएम के रुप मे नरेंद्र मोदी का कोई विकल्प, सक्षम नेतृत्व प्रस्तुत करने में नाकाम रहा।इसका उदाहरण दिल्ली ही है जहां लोकसभा चुनाव में 56 फीसदी से अधिक मत हासिल कर भाजपा ने सभी सातों सीटें जीती थी वहीं विवि चुनाव करीब 38 प्रतिशत मत मिलने के बाद भी यहीं पार्टी 70 में से महज़ 8 सीटों पर सिमट गई। इसका कारण भी साफ़ है, सूबों में सीएम के रूप में भाजपा दमदार, विश्वसनीय, मजबूत विकल्प पेश करने में कामयाब नहीं हो पा रही है।मुख्यमंत्री का चेहरा सामने रखना जरूरी है।मोदी-शाह इसका विकल्प नहीं हो सकते।स्थानीय नेता कुछ नहीं करना चाहते, वे सीधे मोदी के नाम पर चुनाव जीतना चाहते हैं।उन्हें यह नहीं पता, राज्य के मुद्दे अलग होते हैं।लोग अपनी जरूरतों, सहूलियत देखकर वोट देते हैं।भाजपा नेता विवि चुनाव में विदेश की बातें करे यह कुछ तर्कसंगत दिखाई नहीं देता। एक मित्र ने कहा है भाजपा में तमाम फैसलें लेने, सत्ता का केन्द्रीयकरण हो चुका है। भले ही भाजपा स्वयं को एक लोकतांत्रिक, संगठन, कार्यकर्ता आधारित कैडर बेस पार्टी बताए लेकिन सत्ता, संगठन चंद लोंगों तक महदूद हो चुका है। एक मित्र के मुताबिक भाजपा ने दिल्ली विवि चुनाव में धार्मिक आधार पर लोंगों का ध्रुवीकरण करने का प्रयास किया जिसे जनमत ने नामंजूर कर दिया।वैसे 2019 के आम चुनाव से दीगर प्रदेशों के पिछले कुछ चुनाव पर विचार करें तो तस्वीर पर पड़ी धुंध हट सकती है। 2015 के गुजरात चुनाव के बाद से ही भाजपा के ग्राफ में गिरावट देखी जा रही है। 10 वर्षों से कांग्रेस की नीतियों से परेशान आमजन ने भाजपा पर भरोसा किया था लेकिन उसकी अतिवादी, व्यक्तिवादी नीतियां उसके लिए शुभ नहीं रही हैं।स्थानीय मुद्दों, नेताओं की उपेक्षा इस पार्टी को सीधा नुकसान पहुंचा रही हैं।समूचे देश पर भगवा लहराने का दावा,पार्टी के बड़े नेताओं का  बड़बोलापन जनता को रास नहीं आ रहा है।गुजरात मे भाजपा बाल बाल बची।कर्नाटक में सबसे बड़ी पार्टी होने के बावजूद शुरुआती दौर में सरकार नहीं बना सकी।पंजाब, मध्यप्रदेश, झारखंड, छत्तीसगढ़, राजस्थान में भाजपा को पराजय का मुंह देखना पड़ा।हरियाणा में 75 पार के दावे को मतदाताओं ने रिजेक्ट कर दिया। जोड़तोड़ कर यहां सरकार बना सकी।स्वाभाविक हैअब दिल्ली के ताजा नतीजों से विपक्षी दलों का हौसला बढ़ेगा। पूरे देश में एक संदेश भी जाएगा कि यदि मिलीजुली रणनीति, सधी ताकत से भाजपा को सत्ता से बेदखल किया जा सकता है। जनता भी शायद अब हर मुद्दे पर भाजपा को समर्थन नहीं देगी। सच्चाई से काफ़ी दूर होते जा रहे भाजपाई इस बात को कभी स्वीकार नहीं करेंगे कि अब नरेंद्र मोदी का प्रदेशों पहले जैसा असर नहीं रहा है। राज्यों में चुनावी रणनीतिकार, ज़मीन से जुड़े नेता या तो हैं ही नहीं, और हैं भी तो मोदी, शाह के समक्ष बौने हो चुके हैं।
लेकिन यह भी सच्चाई है भाजपा हिंदुओं का ध्रुवीकरण करने में कामयाब नहीं हो पा रही है वहीं मुस्लिम वर्ग जरुर उसे हराने के लिए पूरी तरह लामबंद हो चुका है। यह हालत हर प्रदेश में है। अगर यहां बात दिल्ली की करें तो मुस्लिम लामबंदी के साथ साथ कांग्रेस त्रिकोणीय मुकाबला बनाने में सफल नहीं हो पाई। जहां जहां त्रिकोणीय मुकाबले हुए वहां भाजपा की राह आसान हो जाती है। हलांकि कुछ राज्य इसके अपवाद हैं जहां तीसरा कोई विकल्प है ही नहीं। मोटे तौर भाजपा के सामने जिन जिन राज्यों में मजबूत लीडरशीप है, चाहे वह जाती, धर्म, मज़हब आधारित है, वहां आगे भी इस पार्टी की राह आसान रहने वाली नहीं है। अब यह मुमकिन नहीं है जनता किसी ऐसे मुख्यमंत्री को पसंद करे जो कठपुतली हो। कुछ मित्रों का कहना है कि मुफ़्तख़ोरी के नारे सूबों की सियासत में प्रभावी हो रहे हैं। मुझे लगता है इसमें तो थोड़ा कम या अधिक भाजपा भी शरीक है। मित्रों की राय से एक बड़ी बात यह भी सामने आई है कि भाजपा में कार्यकर्ताओं की घोर उपेक्षा की जा रही है, जिसका खामियाजा इस पार्टी को भुगतना पड़ रहा है। इस बार हरियाणा, महाराष्ट्र के विधानसभा चुनाव में यह बात स्पष्ट तौर पर दिखाई दी थी। जनसंघ से लेकर आरएसएस तक के पुराने, निष्ठावान कार्यकर्ता पूरी तरह उदासीन दिखाई दिए। जिन गुणों से कभी कांग्रेस लबालब थी वे सब धीरे धीरे भाजपा को घेरते नज़र आ रहे हैं। भाजपा में भी संगठन से लेकर सत्ता तक में सिद्धांतों, विचारधारा के स्थान पर व्यक्तिवाद, चापलूसी, अवसरवाद इत्यादि गुण असर दिखा ही नहीं रहे बल्कि जड़े जमा रहे हैं। यहां याद रहे भावनात्मक मुद्दों के आधार पर दीर्धकालीन राजनीति नहीं की जा सकती। आखिरकार ज़मीन पर तो लौटना ही पड़ता है। मेरे विचार से राष्ट्रहित में पीएम मोदी की उपलब्धियां कम नहीं हैं, उन्होंने कई बड़े और कड़े निर्णय लेकर वास्तव में अपनी काबिलियत का परिचय दिया है।जिसके नतीज़े में आवाम नें उन्हें दूसरी बार अधिक ताकत देकर सत्तासीन किया है लेकिन सूबों में स्थानीय मुद्दे,जमीन से जुड़ा नेतृत्व होना जरूरी है। यहां भाजपा पिछड़ती नजर आ रही है। कई मित्रों की राय के अनुसार महंगाई, रोजगार,किसानों की हालत, गिरती अर्थव्यवस्था जैसे मामलों में भाजपा कुछ खास नहीं कर पाई है। जनअपेक्षाओ को पूरा न कर पाने का नुकसान भाजपा को प्रदेशों के चुनाव में उठाना पड़ रहा है। दिल्ली चुनाव परिणामों की चर्चा में एक और बात सामने आई है, भाजपा को वैचारिक मुद्दों को गवर्नेंस के ठोस एजेंडे के साथ मिलाना चाहिए।निचले स्तर पर संवाद बनाए रखने के लिए एक जीवंत और स्थाई स्थानीय इकाई होनी चाहिए,जो अब कम ही नज़र आ रही है।वैसे तो जय-पराजय राजनीति के साथ जुड़ी नियति है लेकिन मेरा मानना है सत्ता से बड़ा देश है। देश का अर्थ केवल ज़मीन, जंगल, नदियां व भूगोलिक स्वरुप नहीं बल्कि वे सांस्कृतिक तत्व हैं जो नागरिकों को एकसूत्र में जोड़े रखते हैं। राजनीति भी सर्वजन हिताय, सर्वजन सुखाय के रास्ते पर चले तो इसे श्रेष्ठ कहा जाएगा....!
धन्यवाद
आपका अनुज... सुरेश गर्ग..
 
 
 
 
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