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गीता का हर अध्याय वैज्ञानिक, वैचारिक व व्यावहारिक है: स्वामी ज्ञानानंद महाराज गीतामनीषी ने गौसेवा आयोग के चैयरमैन श्रवण गर्ग के कार्यालय का किया उद्घाटन

January 22, 2021 07:52 PM
गीता का हर अध्याय वैज्ञानिक, वैचारिक व व्यावहारिक है: स्वामी ज्ञानानंद महाराज
गीतामनीषी ने गौसेवा आयोग के चैयरमैन श्रवण गर्ग के कार्यालय का किया उद्घाटन
सफीदों,- अग्रजन पत्रिका ब्यूरो-- (महाबीर मित्तल): गीता का हर अध्याय वैज्ञानिक, वैचारिक व व्यावहारिक है। उक्त उद्गार गीता मनीषी महामंडलेश्वर स्वामी ज्ञानानंद महाराज ने प्रकट किए। वे शुक्रवार को नगर की पुरानी अनाज मंडी स्थित हरियाणा गौसेवा आयोग के चैयरमैन श्रवण कुमार गर्ग के कैंप कार्यालय का उद्घाटन कर रहे थे। इस मौके पर हरियाणा कर्मचारी चयन आयोग के सदस्य एडवोकेट विजयपाल सिंह विशेष रूप से उपस्थित थे। हरियाणा गौसेवा आयोग के चैयरमैन श्रवण कुमार गर्ग व समाजसेवी सौरभ गर्ग ने माल्यार्पण करके गीता मनीषी स्वामी ज्ञानानंद महाराज का अभिनंदन किया। अपने आशीर्वचन में स्वामी ज्ञानानंद महाराज ने कहा कि किसी आयोग या संस्था के प्रधान का पद प्रतिष्ठा व मान के साथ-साथ दायित्व और सेवा का भी होता है। उन्हें उम्मीद है कि श्रवण कुमार गर्ग अपने दायित्व का बेहतरी से निर्वहण करेंगें। उन्होंने कहा कि जहां आज हम गौमाता को अन्नपूर्णा और भगवान का रूप मानते हैं वहीं दूसरी तरफ सड़कों पर घूम रहे गौवंश बेसहारा और असहाय नजर आते हैं। सड़कों पर गौवंश ना मिले इसके लिए गौ सेवा आयोग तत्परता के साथ कार्य करे। गीता समुंद्र की तरह है, इसकी कोई थाह नहीं पा सकता। आप जितने बार गीता का अध्ययन करोगे, आपको हर बार नया अनुभव होगा। आध्यात्मिक उन्नति के लिए इंसान को अपने मन के भाव बदलने होंगे और ये भाव गीता जी के अध्ययन एवं सत्संग द्वारा ही बदले जा सकते हैं। मनुष्य जन्म परमात्मा से जुडऩे का एकमात्र साधन है क्योंकि मनुष्य के अलावा किसी जीव में विवेक नहीं है। मनुष्य को विवेक इसलिए मिला है कि वह सोचे समझे और निर्णय करे लेकिन इस युग में मनुष्य का विवेक उस तरह लुप्त हो गया है जैसे सूर्य के सामने बादल आ गए हो। विवेक को सिर्फ सुमिरन एवं सत्संग से ही जागृत किया जा सकता है। कुसंग जागी हुई बुद्धि को सुला देता है और विवेक को लुप्त कर देता है। गीता मनीषी ने कहा कि संसार के प्रलोभन एकदम खींचते हैं और बुद्धि काम करना बंद कर देती है। बाद में पता चलता है कि अनमोल जीवन भौतिकता में बिताने के लिए नहीं था। केवल सत्संग ही ऐसी चीज है जो अंदर के विवेक को जगाता है। जीवन की सबसे बड़ी और पहली आवश्यकता सत्संग है।
फोटो कैप्शन 1.: कार्यालय के उद्घाटन के उपरांत अपना आशीर्वचन देते हुए गीता मनीषी स्वामी ज्ञानानंद महाराज।
 
 

 

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